क्यों नहीं हम किसी को
ऐसे देख पाते हैं
जैसे कि खुद को देखना चाहते हैं
क्यों नहीं हम वैसे सोचते हैं
जैसे कि चाहते हैं हर कोई सोचे
क्यों हम नियमों में बंधते जाते हैं
अपनी खुशी को ग्रहण लगाते हैं
और जब बंधन तोड़ते भी हैं तो
वैसे ही जैसे कि नियम बताते हैं
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