Monday, March 12, 2012

अनुभव

 पत्थर 

यह कविता जीवन के कटु अनुभवों के  महत्व को उजागर करती है

चीख चीख कह रहे हैं
पैरों में जड़े रास्ते के पत्थर,
ठहर जा और सोच मुसाफिर
क्या नहीं पाया तुने इस पथ चलकर

सड़क पर थे जब की ये
कुछ हस्ती इनकी भी थी,
तुने ठोकर क्या लगायी
लहू तेरा नहीं आहुति इनकी ही थी

अगर कभी ठोकर लग जाती तुम्हे
लहू तुम्हारा, पर इनके सीने का सहारा था
सींच उसी लहू से गुलशन को
बाग़ इन्ही ने तो निखारा था

अकेले चलने का जो प्रण लिया तुमने
न कह सकेंगे ये दिलजले पत्थर
की मत जुदा कर हमें खुद से
सहने हैं तुझे कुछ बड़े पत्थर

कदम बोझिल बना दें गर हम कभी
बना देना हमें मील का पत्थर,
और पथ पर आगे बढ़कर
चुन लेना कुछ नए पत्थर

जो कि राह होती खूब मुलायम
पैर तेरे धंस न जाते वहीँ,
दुहाई जिनकी दे रहा है तू
बंध उन्ही फूलों में फंस न जाते कहीं

आहुति प्राणों कि दी होगी तुने, मगर
साथ तेरे सदा चल कर
और फिर तेरी कब्र पर लगकर
गान तेरे ही गाते ये बुझे पत्थर

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