Wednesday, March 14, 2012

मैं अब भी रो सकता हूँ

कठिनाई न पार लगे जब
सरित कूल मझदार लगे जब
फिर भी नौका खे सकता हूँ

बदन के घाव न टांकते बनें
हृदय की पीड़ा ना बाँचते चलें
तलवार नोंक पर सो सकता हूँ

तेज हवा जब बहने लगे
महल नीव संग ढहने लगे
एक हवा संग हो सकता हूँ

औरों के तन ढकने को
खुद का भी मन रखने को
नग्न और भी हो सकता हूँ

 मैं अब भी रो सकता हूँ 

यह कविता एक ऐसे व्यक्ति के मन की अवस्था दर्शाती है जिसे दुनिया पत्थर -दिल समझती है , और वह अपनी भावनाएं व्यक्त करने की कोशिश करता है
कठिनाई न पार लगे जब
सरित कूल मझदार लगे जब
फिर भी नौका खे सकता हूँ

बदन के घाव न टांकते बनें
हृदय की पीड़ा ना बाँचते चलें
तलवार नोंक पर सो सकता हूँ

तेज हवा जब बहने लगे
महल नीव संग ढहने लगे
एक हवा संग हो सकता हूँ
मैं अब भी रो सकता हूँ



Monday, March 12, 2012

हम क्या चाहते हैं

क्यों नहीं हम किसी को
ऐसे देख पाते हैं
जैसे कि खुद को देखना चाहते हैं

क्यों नहीं हम वैसे सोचते हैं
जैसे कि चाहते हैं हर कोई सोचे

क्यों हम नियमों में बंधते जाते हैं
अपनी खुशी को ग्रहण लगाते हैं
और जब बंधन तोड़ते भी हैं तो
वैसे ही जैसे कि नियम बताते हैं

पर्दा


ज़ब धूप बहुत तीखी हो जाती है ,
बदन को बहुत जलाती है ,
तो मैं घर के परदे लगा लेता हूँ |

पर जब घूप जाती , बस छांह रह जाती है ,
अंतर्मन्न में ठंड का एहसास दिलाती है ,
परदे उठाना भूल क्यों जाता हूँ |

अनुभव

 पत्थर 

यह कविता जीवन के कटु अनुभवों के  महत्व को उजागर करती है

चीख चीख कह रहे हैं
पैरों में जड़े रास्ते के पत्थर,
ठहर जा और सोच मुसाफिर
क्या नहीं पाया तुने इस पथ चलकर

सड़क पर थे जब की ये
कुछ हस्ती इनकी भी थी,
तुने ठोकर क्या लगायी
लहू तेरा नहीं आहुति इनकी ही थी

अगर कभी ठोकर लग जाती तुम्हे
लहू तुम्हारा, पर इनके सीने का सहारा था
सींच उसी लहू से गुलशन को
बाग़ इन्ही ने तो निखारा था

अकेले चलने का जो प्रण लिया तुमने
न कह सकेंगे ये दिलजले पत्थर
की मत जुदा कर हमें खुद से
सहने हैं तुझे कुछ बड़े पत्थर

कदम बोझिल बना दें गर हम कभी
बना देना हमें मील का पत्थर,
और पथ पर आगे बढ़कर
चुन लेना कुछ नए पत्थर

जो कि राह होती खूब मुलायम
पैर तेरे धंस न जाते वहीँ,
दुहाई जिनकी दे रहा है तू
बंध उन्ही फूलों में फंस न जाते कहीं

आहुति प्राणों कि दी होगी तुने, मगर
साथ तेरे सदा चल कर
और फिर तेरी कब्र पर लगकर
गान तेरे ही गाते ये बुझे पत्थर

अनुभव

चीख चीख कर रहे हैं,
पैरों में जड़े रास्ते के पत्थर
ठहर जा और सोच मुसाफिर,
क्या नहीं पाया तुने इस पथ चलकर

सड़क पर थे जब की ये,
कुछ हस्ती इनकी भी थी
तुने ठोकर क्या लगायी,
लहू तेरा नहीं आहुति इनकी ही थी

अगर कभी ठोकर लग जाती तुम्हे
लहू तुम्हारा पर इनके सीने का सहारा था
सींच उसी लहू से गुलशन को
बाग़ इन्ही ने तो निखारा था

अकेले चलने का जो प्रण लिया तुमने
न कह सकेंगे ये दिलजले पत्थर
की मत जुदा कर हमें खुद से
सहने हैं उझे कुछ बड़े पत्थर

कदम बोझिल बना दें गर हम कभी
बना देना हमें मील का पत्थर
और पथ पर आगे बढ़कर
चुन लेना कुछ नए पत्थर

जो कि राह होती खूब मुलायम
पैर तेरे धंस न जाते वहीँ
दुहाई जिनकी दे रहा है तू
बांध उन्ही फूलों में फंस न जाते कहीं

आहुति प्राणों कि दी होगी तुने, मगर
साथ तेरे सदा चल कर
और फिर तेरी कब्र पर लगकर
गान तेरे ही गाते ये बुझे पत्थर